Friday, August 21, 2015

बेटियां

बेटियां शुभकामनाएं हैं,
बेटियां पावन दुआएं हैं।
बेटियां जीनत हदीसों की,
बेटियां जातक कथाएं हैं।
बेटियां गुरुग्रंथ की वाणी,
बेटियां वैदिक ऋचाएं हैं।
जिनमें खुद भगवान बसता है,
बेटियां वे वन्दनाएं हैं।
त्याग, तप, गुणधर्म, साहस की
बेटियां गौरव कथाएं हैं।
मुस्कुरा के पीर पीती हैं,
बेटी हर्षित व्यथाएं हैं।
लू-लपट को दूर करती हैं,
बेटियाँ जल की घटाएं हैं।
दुर्दिनों के दौर में देखा,
बेटियां संवेदनाएं हैं।
गर्म झोंके बने रहे बेटे,
बेटियां ठंडी हवाएं हैं।

लाड़ली बेटी

लाड़ली बेटी जब से स्कूल जाने है लगी।
हर खर्चे के कई ब्योरे मां को समझाने लगी।।
फूल-सी कोमल और ओस की नाजुक लड़ी।
रिश्तों की पगडंडियों पर रोज मुस्काने लगी।।
एक की शिक्षा ने कई कर दिए रोशन चिराग।
दो-दो कुलों की मर्यादा बखूबी निबाहने लगी।।
बोझ समझी जाती थी जो कल तलक सबके लिए।
घर की हर बाधा को हुनर से वही सुलझाने लगी।
आज तक वंचित रही थी घर में ही हक के लिए।
संस्कारों की धरोहर बेटों को बतलाने लगी।।
वो सयानी क्या हुई कि बाबुल के कंधे झुके।
उन्हीं कंधों पर गर्व के परचम लहराने लगी।।
पढ़-लिखकर रोजगार करती, हाथ पीले कर चली।
बेटी न बेटों से कम ये बात समझ में आने लगी।।

Wednesday, June 24, 2015

बेटी

                                                              मेरी प्यारी बेटी
                                                                  ~~~~~~

पलकों में पली साँसों में बसी माँ की आस है बेटी
हर पल मुस्काती गाती एक सुखद अहसास है बेटी
गहन अंधेरी रातों में जैसे, भोर की उजली किरन है बेटी
सूने आँगन में खिली, मासूम कली की सी मुस्कान है बेटी
मान अभिमान है बेटी, दोनों कुलों की लाज है बेटी
दुख दर्द अंदर ही सहती,एक खामोश आवाज़ है बेटी
तपित धरती पर सघन छाया सी, शीतल हवा है बेटी
लक्ष्मी दुर्गा सरस्वती सी,बुजुर्गो की पावन दुआ है बेटी
करते विदा जब डोली में,तब पराई होजाती है बेटी
उदास मन सूना आँगन, फिर बहुत याद आती है बेटी

Sunday, May 17, 2015

बेटी की पुकार🌹🌹

बेटी की पुकार🌹🌹
बेटी ये कोख से बोल रही,
माँ करदे मुझपे ये उपकार,।।
बिन मेरे माँ तुम भैया को,
राखी किससे बन्धवाओगी,।।
मरती रही कोख की हर बेटी,
तो बहु कहा से लाओगी,।।
बेटी ही बहन,बेटी ही दुल्हन,
बेटी से ही होता परिवार,।।
मत मार मुझे जीवन दे दे,
मुझको भी देखने दे संसार,।।
मानेंगे पापा भी अब माँ,
तुम बात बता के तो देखो,।।
दादी नारी,तुम भी नारी,,
सबको समझा कर तो देखो,।।
बिन नारी,प्रीत अधूरी है,,
नारी बिन सुना है घर बार,।।
मत मार मुझे..................
मुझको भी देखने.............
नहीं जानती में इस दुनिया को,
मैने जाना माँ बस तुमको,।।
मुझे पता तुझे फिकर मेरी,,
तू मार नहीं सकती मुझको,।।
फिर क्यों इतनी मजबूर है तू,
माँ क्यूँ है तू इतनी लाचार,।।
मत मार मुझे..................,
मुझको भी देख................
गर मै न हुई तो माँ फिर तू,,
कीसे दिल की बात बताएगी,।।
मतलब की इस दुनिया में माँ,
तू घुट घुट के रह जायेगी,।।
बेटी ही समझे माँ का दुःख,
अंकुश करलो बेटी से प्यार,।।
मत मार मुझे....................
बेटी ये कोख ....................
मत मार मुझे जीवन दे दे,
मुझको भी देखने दे संसार।

Monday, April 20, 2015

betiya

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये, उसे कहते हैं बिटिया
थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए, उसे कहते हैं
बिटिया
"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये, उसे कहते हैं 
बिटिया
हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये, उसे कहते हैं
बिटिया
घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं
बिटिया
सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये, उसे कहते हैं
बिटिया
दूर जाने पर जो बहुत रुलाये, उसे कहते हैं
बिटिया
पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये, उसे कहते हैं
बिटिया
मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये, उसे कहते हैं
बिटिया
"अनमोल हीरा" जो इसीलिए कहलाये, उसे कहते हैं
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Monday, January 19, 2015

बेटी

बेटी नहीं है पराया धन
तुम्हारे जाने के बाद,
आ रहें मुझे वह पल याद,
विदाई के समय रोना फुट-फुटकर !
होस्टल मे भेजे जानेवाले बच्चे के बराबर,
दुबिधा मे डूबा हुवा तुम्हारा मन,
शायद कुछ प्रश्न के उत्तर खोजता चिंतन ,
शुरुआत का डर नये रिश्तों का-
"पुराने" को स्मृतियों के हवाले करने का !
बीता हुवा बचपन, बाबुल का आंगन,
अपने सारे पलों का कढ़वा या मीठापन,
मैं समझकर भी बना हुवा तटस्थ- नासमझ
उंच्च-नीच की तहजीब और परम्परा का बोझ,
लग गया हौशला दिखाने , दिलासा दिलाने मे,
हमारी छोढ़,सोच अपने सुनहरे कल के बारे मे ,
याद भी नहीं आयेगी,बहुत प्यार मिलेगा,
सब लोग, भाई तुम्हारा, मेरा ख्याल रखेगा |
भोलेपन से या मजबूरी से क्या स्वीकार,
सिसकते-सिसकते गई, छोढ़ बाबुल का संसार |
वक़्त के साथ,बीतें लम्हों के साये मे,
जिन्दगी के धुप-छावं तले, सुख-दुःख मे,
फिर भी हर पल तुम, मेरे आस-पास रहती ,
मेरी पीढ़ा, खुशी और गम को खुद मे झेलती,
जब की मैंने "तुम्हे" तुम्हारे भाग्य के हवाले किया,
पर तुम सहभागी बन हमेशा साथ दिया,
आज भी पिया-घर रहते, बाबुल मे जीती ,
आये-गये मुझे "माँ" बनकर अनुशाषित करती ,
मेरी आवाज के उतार-चढ़ाव से समझ जाती,
मेरी दिल की भी बात तुमसे छिप नहीं पाती |
बिकट, कठिन और बिषम हर अवस्था पहचान,
बार-बार फ़ोन करती हो जाती हो कितना परेशान !!
तब मेरे अन्दर सोच का तांडव मचाता घमाशान,
पास के लोग मेरे, बेटे-बहु, या किस-किस का ब्याखन-
पराया धन सोचकर जीसे रुलाकर विदा किया था ,
वही धन अब, सब से पास, और ज्यादा काम आता |

बेटी

एक पिता की प्रार्थना अपनी बेटी की शादी में अपने दामाद से
__________________________
माँ की ममता का सागर ये,
मेरी आँखों का तारा है ! 
कैसे बतलाऊँ तुमको ,
किस लाड प्यार से पाला है !!
तुम द्वारे मेरे आए हो,
मैं क्या सेवा कर सकता हूँ !
ये कन्या रूपी नवरत्न तुम्हें,
मैं आज समर्पित करता हूँ !!
मेरे ह्रदय के नील गगन का,
ये चाँद सितारा है !
मैं अब तक जान ना पाया था,
इस पर अधिकार तुम्हारा है !!
ये आज अमानत लो अपनी,
करबद्ध निवेदन करता हूँ !
ये कन्या रूपी नवरत्न तुम्हें,
मैं आज समर्पित करता हूँ !!
इससे कोई भूल होगी,
ये सरला है , सुकुमारी है !
इसकी हर भूल क्षमा करना ,
ये मेरे घर की राजदुलारी है !!
मेरी कुटिया की शोभा है,
जो तुमको अर्पण करता हूँ !
ये कन्या रूपी नवरत्न तुम्हें ,
मैं आज समर्पित करता हूँ !!
भाई से आज बहन बिछ्ड़ी ,
माँ से बिछ्ड़ी उसकी ममता !
बहनों से आज बहन बिछ्ड़ी ,
लो तुम्हीं इसके आज सखा !!
मैं आज पिता कहलाने का,
अधीकर समर्पित करता हूँ !
ये कन्या रूपी नवरत्न तुम्हें,
मैं आज समर्पित करता हूँ !!
जिस दिन था इसका जन्म हुआ,
ना गीत हुए ना बजी शहनाई !
पर आज विदाई के अवसर पर,
मेरे घर बजती खूब शहनाई !!
यह बात समझकर मैं,
मन ही मन रोया करता हूँ !
ये गौकन्या रूपी नवरत्न तुम्हें,
मैं आज समर्पित करता हूँ !!
ये गौकन्या रूपी नवरत्न तुम्हें,
मैं आज समर्पित करता हूं .....
बहुत सुन्दर लाईन
दहेज़ में बहु क्या लायी...
ये सबने पूछा...
लेकिन एक बेटी क्या क्या छोड़ आई...
किसी ने सोचा ही नहीं...

बेटी

ज्ञात कोख में बेटी होगी, एवर्सन से उसे गिराते।
बेटी होती घर में मातम, बेटा होता खुशी मनाते।।
देख न पाई कैसी दुनियाँ, उसे पेट में मसल दिया है।
कहते कभी न चीटी मारी, पर बेटी का कतल किया है।।
सब धर्मों में, सब समाज में, बेटी क्यों अपराध बनी है?
आगे चलकर जीवन देती, बेटी क्यों अभिशाप बनी है??
जिसने पुत्र किया है पैदा, उसने ही बेटी है जन्मी।
बेटा हो सुख, बेटी हो दुख, यह मानवता की बेशर्मी।।
पिता डाँट माँ की फटकारें, वह समझे कि प्यार यही है।
लाड प्यार केवल भाई को, उसने केवल मार सही है।।
गलती से गलती हो जाये, कहते सब यह पागल मूरख।
वह कहती गलती धोखे से, सब कहते यह करती बकबक।।
जानबूझकर कर देता है, बेटा अगर बड़ी कोइ गलती।
उस पर तो मम्मी पापा की, नजर नहीं जाने क्यों पड़ती।।
बेटी माँगे कोई खिलौना, बातों से उसको बहलाते।
बेटा माँगे कोई खिलौना, एक नहीं दो-दो दिलवाते।।
सुन्दर नये भाई को कपड़े, बहने उसका उतरन पहनें।
बदल गई है कितनी दुनियाँ, मगर उपेक्षित फिर भी बहनें।।
बेटी घर की रौनक होती, बेटी घर की जिम्मेदारी।
बेटी है तो घर में खुश्बू, घर की करती पहरेदारी।।
उसको सबकी चिंता रहती, सबको खुशियाँ देने वाली।
ईश्वर की यह कैसी माया, उसकी किस्मत रोने वाली।।
बीमारी में बेटी सम्मुख, बेटी घऱ की पीड़ा हरती।
बेटे घर संकट लाते, बेटी घर में खुशियाँ भरती।।
भाई को वह बहुत चाहती, बेटी को है सहना आता।
सबका दुख वह हरने वाली, अपना दुख न कहना आता।।
संविधान में हक हैं सारे, पर घर में अधिकार नहीं है।
मात-पिता के क्यों अधिकारी, बेटी से जो प्यार नहीं।।
बचपन को वह जान न पाई, कब है आता कब है जाता।
बचपन का आभास उसे तब, जिस दिन बेटी बनती माता।।

बेटियाँ



●~~"बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती है पीहर"~~●
~~~~
..बेटियाँ..
..पीहर आती है..
..अपनी जड़ों को सींचने के लिए..
..तलाशने आती हैं भाई की खुशियाँ..
..वे ढूँढने आती हैं अपना सलोना बचपन..
..वे रखने आतीं हैं..
..आँगन में स्नेह का दीपक..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..
~~~
..बेटियाँ..
..ताबीज बांधने आती हैं दरवाजे पर..
..कि नज़र से बचा रहे घर..
..वे नहाने आती हैं ममता की निर्झरनी में..
..देने आती हैं अपने भीतर से थोड़ा-थोड़ा सबको..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..
~~~
..बेटियाँ..
..जब भी लौटती हैं ससुराल..
..बहुत सारा वहीं छोड़ जाती हैं..
..तैरती रह जाती हैं..
..घर भर की नम आँखों में..
..उनकी प्यारी मुस्कान..
..जब भी आती हैं वे, लुटाने ही आती हैं अपना वैभव..
..बेटियाँ कुछ लेने नहीं आती हैं पीहर..

beti

Dedicated To All The Females..
Beti ko Chand jaisi mat banao ki har koi ghur ghur ke
dekhe...
Per
Beti ko Suraj jaisi banao taki ghur ne se pahele sab ki
nazar juk jaye...
--------------------------------------
"Jo 'Mummy' or 'Papa' ko Swarg le jaata hai, wo "Beta" Hota hai par,
Jo Swarg ko Ghar Le aaye, wo "Beti" Hoti hai".....!

betiya

लड़की को मत समझो बेकार।
इसके बिना है अधूरा हर परिवार।।
बहन बनकर जिसने है हर भाई को प्यार से सम्भाला।
बेटी बनकर जिसने है भरा हर बाप के दिल में खुशियो का उजाला।।
फ्रेंड बनकर समझाया जिसने।
शादी कर के दूसरा घर चलाया भी इसने।।
लड़की न होती तो आज माँ न होती।
माँ न होती तो आज जननी कौन होती?
जीना बस लड़को का नही है अधिकार।
लड़की से ही है खुश हर परिवार।।
लड़की को मत समझो बेकार।
इसके बिना है अधूरा हर परिवार।।

Sunday, September 7, 2014

Ye Betiyan Kesi Hoti Hain...

Ye Betiyan Kesi Hoti Hain...

Ye Betiyan Kesi Hoti Hain
Ye Pariyon Jesi Hoti Hain...

Ye Baat Baat Pe Hansti Hain
Ye Baat Baat Pe Roti Hain...

Dil Hota Hai In Ka Nazuk
Ye Bholi Bhali Hoti Hain...

Baba Ki Ladli Hoti Hain
Mama Ki Dulari Hoti Hain...

Guryon Se Khelta Bachpan Inka
Itni Jaldi Kese Beet Gaya...

Aangan Soona Kar Jati Hain
Ghar Sy Ronaq Ly Jati Hain...

Baba Ka Dard Samajhti Hain
Mumma K Aansoo Pochti Hain...

Ye Betiyan Aisi Hoti Hain
Ye Betiyan Aisi Hoti Hain...

Sunday, December 1, 2013

bitiya

देवी का रूप देवो का मान है बेटिया
घर को जो रोशन करे वो चिराग होती बेटिया
माँ की छाव पिता का अभिमान होती बेटिया
मत मारो इनको कोख में...
बेटो को जो जन्म दे वो माँ होती बेटिया ।।

कभी लक्ष्मी बाई कभी हाडा रानी होती बेटिया
कभी कल्पना तो कभी सुनीता है बेटिया
अपने लाल को जो करे वतन पे कुर्बान...
ऐसी वीरांगना पन्नाधाय होती बेटिया ।।

जमीं से लेकर नभ तक छाई हुई है बेटिया
नवरात्री के नव व्रत होती बेटिया
मत करो अभिमान सिर्फ बेटो पर....
बेटा गर भाग्य है तो सौभाग्य होती बेटिया ।।

सीता, सावित्री, सत्यभामा होती बेटिया
कभी राधा तो कभी मीरा बाई है बेटिया
बेटा तो एक कुल का चिराग है....
दो दो कुल की लाज होती बेटिया ।।
*****SAVE GIRLS*****

bitiya

एक औरत गर्भ से थी पति को जब पता लगा की
कोख में बेटी हैं तो वो उसका गर्भपात करवाना चाहते
हैं दुःखी होकर पत्नी अपने पति से क्या कहती हैं :-
सुनो, ना मारो इस नन्ही कलि को,
वो खूब सारा प्यार हम पर लुटायेगी,
जितने भी टूटे हैं सपने, फिर से वो सब सजाएगी..
सुनो, ना मारो इस नन्ही कलि को,
जब जब घर आओगे तुम्हे खूब हंसाएगी,
तुम प्यार ना करना बेशक उसको, वो अपना प्यार लुटाएगी..
सुंनो, ना मारो इस नन्ही कलि को,
हर काम की चिंता एक पल में भगाएगी,
किस्मत को दोष ना दो, वो अपना घर आंगन महकाएगी..
ये सब सुन पति अपनी पत्नी को कहता हैं :-
सुनो में भी नही चाहता मारना इस नन्ही कलि को,
तुम क्या जानो, प्यार नहीं हैं क्या मुझको अपनी परी से,
पर डरता हूँ समाज में हो रही रोज रोज की दरिंदगी से..
क्या फिर खुद वो इन सबसे अपनी लाज बचा पाएगी,
क्यूँ ना मारू में इस कलि को, वो बहार नोची जाएगी..
में प्यार इसे खूब दूंगा, पर बहार किस किस से बचाऊंगा,
जब उठेगी हर तरफ से नजरें, तो रोक खुद को ना पाउँगा..
क्या तू अपनी नन्ही परी को, इस दौर में लाना चाहोगी,
जब तड़फेगी वो नजरो के आगे, क्या वो सब सह पाओगी,
क्यों ना मारू में अपनी नन्ही परी को,
क्या बीती होगी उनपे, जिन्हें मिला हैं ऐसा नजराना,
क्या तू भी अपनी परी को ऐसी मौत दिलाना चाहोगी..
ये सुनकर गर्भ से आवाज आती हैं सुनो माँ पापा
में आपकी बेटी मेरी भी सुनो :-
पापा सुनो ना, साथ देना आप मेरा,
मजबूत बनाना मेरे हौसले को,
घर लक्ष्मी हैं आपकी बेटी, वक्त पड़ने पे में काली भी बन जाउंगी,
पापा सुनो, ना मारो अपनी नन्ही कलि को,
उड़ान देना मेरे हर वजूद को,
में भी कल्पना चावला की तरह, ऊँची उड़ान भर जाउंगी..
पापा सुनो, ना मारो अपनी नन्ही कलि को,
आप बन जाना मेरी छत्र छाया,
में झाँसी की रानी की तरह खुद की गैरो से लाज बचाउंगी..
पति (पिता) ये सुन कर मौन हो गया और उसने अपने फैसले पे
शर्मिंदगी महसूस करने लगा और कहता हैं अपनी बेटी से :-
में अब कैसे तुझसे नजरे मिलाऊंगा,
चल पड़ा था तुम्हारा गला दबाने,
अब कैसे खुद को तुम्हारे सामने लाऊंगा,
मुझे माफ़ करना ऐ मेरी बेटी,
तुझे इस दुनियां में सम्मान से लाऊंगा..
वहशी हैं ये दुनिया तो क्या हुआ,
तुझे बहादुर बिटियाँ बनाऊंगा..
मेरी इस गलती की मुझे हैं शर्म,
घर घर जाके सबका भ्रम मिटाऊंगा
बेटियां बोझ नहीं होती..
अब सारे समाज में अलख जगाऊंगा_

Monday, October 7, 2013

बिटिया

अपनी बेटी भी प्यारी है और परम्परा भी!

बिटिया जो सबसे प्यारी है, जग में सबसे वह न्यारी है!

बचपन में न वह रोती थी, खा पीकर के जो सोती थी.

बाबाजी सामने रहते थे, बिटिया को चूमा करते थे.

मूंछों को देख वो हंसती थी, बाबा की प्यारी पोती थी!

रोती भी नहीं कभी खुलकर, ‘गूंगी होगी आगे चलकर’ !

ये ‘प्यार के बोल’ निकलते थे, बाबाजी हंसकर कहते थे.

बिटिया थोड़ी अब बड़ी हो गयी, रोऊँ क्यों, अब तो खड़ी हो गयी!

पापा ने सब कुछ झेला है, उनका मन बहुत अकेला है.

रोते वे नहीं विपदाओं से, होते खुश हर आपदाओं से.

जीवन ने उन्हें सिखाया है, अग्नि ने उन्हें तपाया है

सोना तपने से निखरता है, मानव मन तभी सुधरता है!

जो कुछ वे मुझे सिखाते हैं, अपना अनुभव बतलाते हैं.

बेटी तू रोना कभी नहीं, आपा तू खोना कभी नहीं.

वो’ जो सबका दाता है, सबका ही ‘भाग्य-विधाता’ है.

सुनते है ‘वे’ हम सबकी ही, चाहे तुम कहो या कहो नहीं.

सबकी भलाई ‘वे’ करते हैं, भक्तों पर ही ‘वे’ मरते हैं.

बिटिया जैसी तू प्यारी है, तू भी सबका हितकारी है.

‘वो’ दूर देश से आएगा, घोड़े पर तुझे बिठाएगा.

उड़ जायेगा ‘वो’ बन के हवा, पर सदा साथ हो मेरी दुआ.

न कभी तुझे वो रुलाएगा, बातों से सदा हंसायेगा.............

Wednesday, October 2, 2013

बेटिया

कितना कुछ सह जाती है बेटिया
अक्सर चुप रह जाती है बेटिया !!

कहाँ तक हिफाजत रखे अपनी -
जब घर में ही बेआबरू हो जाती है बेटिया!

अक्सर चाह कर भी ,नहीं कर पाती कुछ -
अरमानो का गला घौट रह जाती है बेटिया !!

बदल लेती है ,बक्त के साथ खुद को-
हर हाल ढल - जाती है बेटिया !!

क्यों इनका इतना खौप खाते है लोग-
जो कौख में क़त्ल कर दी जाती है बेटिया !!

हरेक कदम पर चुनौती है इनके -
मेहनत से आगे बड जाती है बेटिया !!

बेटी किसी की बहन कभी ,प्रेमिका भी होती
रिश्तो के कितने रंगों में रंग जाती है बेटिया !!


कितना कुछ सह जाती है बेटिया
अक्सर चुप रह जाती है बेटिया !!

Tuesday, October 1, 2013

bitiya

"मेरी बेटीँ"तेरे कदमोँ की आहट,तेरी पायल की छन-छन,

जब आँगन मेँ तू दौडे,याद आये मेरा बचपन,

मेरी बेटी हैँ तू ,हैँ मेरा दर्पण,मेरी छवि हैँ तुझमेँ,

मैँ नजर आती हूँ तुझमेँ,मेरा कोई बेटा ना हैँ,

तू ही हैँ मेरा बेटा,तू ही हैँ 'ज्योति' ,

जब से जीवन मेँ तुम आयीँ,खुशियो से भर गया हैँ जीवन,

हमेँ गर्व हैँ स्वयं पर,हमनेँ जन्मी हैँ बेटीं,

पिता का पुत्र हैँ तू ,तू ही हैँ मेरी बेटी||"

Friday, September 27, 2013

bitiya

"त्याग की सूरत है बेटी
ममता की मूरत है बेटी||
सस्कारों की जान है बेटी
हर घर की तो शान है बेटी||
खुशियों का संसार है बेटी
प्रेम का आधार है बेटी||
शीतल सी एक हवा है बेटी
सब रोगों की दवा है बेटी||
ममता का सम्मान है बेटी
मात-पिता का मान है बेटी||
आँगन की तुलसी है बेटी
पूजा की कलसी है बेटी||
सृष्टि है, शक्ति है बेटी
दृष्टि है, भक्ति है बेटी
श्रद्धा है, विश्वास है बेटी||"

Wednesday, September 25, 2013

bitiya

"आ गयी घर में एक नन्ही सी कली,
जिसकी मुस्कान की खुशियाँ इस दिल में हैं पली,
वो निभाएगी दायित्व और सर फख्र से ऊँचा होगा,
जिस अरमान को उसके आगमन पे सींचा होगा,
उनके फलीभूत होने पर गर्व की अनुभूति होगी,
उसको हर वर्ग हर धर्म से सहानुभूति होगी
उसके दो शब्द मन में मिस्री घोल देते हैं,
कानों में जैसे संजीवनी डोल देते हैं.
कहती हैं निभाती हैं मर्यादा की रस्मों को,
परिवार के समाज के दायित्व को सपनो को,
हर कष्ट में माँ बाप के वो दौड़ के आती हैं,
अपनी सेवा से वो बेटों को पीछे कर जाती हैं,
इनको पढाओ इनको सिखाओ कि मानवता क्या है,
देश और समाज में इनका कर्तव्य सिर्फ सेवा है ...||"

Monday, December 3, 2012

betiya


बाबुल की आन और शान है बेटी ,
इस धरा पर मालिक का वरदान
ही बेटी ,

जीवन यदि संगीत है तो सरगम
ही बेटी ,
रिश्तो के कानन में भटके इन्सान
की मधुबन सी मुस्कान ही बेटी,

जनक की फूलवारी में कभी प्रीत
की क्यारी में ,
रंग और सुगंध का महका गुलबाग
ही बेटी ,

त्याग और स्नेह की सूरत है ,
दया और रिश्तो की मूरत ही
बेटी ,

कण – कण है कोमल सुंदर
अनूप है बेटी ,
ह्रदय की लकीरो का सच्चा
रूप है है बेटी ,

अनुनय , विनय , अनुराग
है बेटी ,
इस वसुधा और रीत और प्रीत
का राग है बेटी ,

माता – पिता के मन का
वंदन है बेटी ,
भाई के ललाट का चंदन
है बेटी ।

ये बेटियां




छोड़ के ये सब ताल तलैया
कल तुझको उड़ जाना है
जिन बागों में खेली कूदी
वो सब तो बेगाना है
याद मुझे सब होली दीवाली
खेल खिलौने हंसी ठिठोली
गुड्डे गुड़िया की वो शादी
आज हकीकत में है बदली
कल जब तेरा होगा जाना
हो जाएगा आंगन सूना
चुपके चुपके याद में तेरी
रोएगा घर का हर कोना
याद करेगा भैया तुझको
गुड़िया तेरी याद करेगी
पिता तो पत्थर रख लेगा पर
माँ तुझको ही याद करेगी
बेटी तो सदा पराया धन
जा तुझको सुखी संसार मिले
बस दुआ इतनी सी है
इस घर से भी ज्यादा प्यार मिले

Saturday, November 10, 2012

मैं बेटी हूँ !
पर मैं तो बेटी हूँ ...
ना मैंने कभी जिद की,
ना ही मेरी जिदें पूरी हुई...
जिद थी जीने की,
जिद थी पढ़ने की...
जिद थी लड़कों के बराबर माने जाने की !
भाई तो करे मस्ती खूब,
मैं तो करती चूल्हा-चाकी..
वो करता सबको तंग,
मैं करती दुलार सभी का..
पर मैं तो बेटी हूँ ...
भाई पढ़ा अच्छी स्कूल में,
पर मैं तो थी सरकारी !
वहां पढ़ी,
बनी अबला से सबला...
दूरियां बनी बाधा...
गांव से बाहर ना जा पाई..
बहुत हुई सरकारी,
अब तो होना था परायी !
ना मैंने जाना,
ना थी पूछने की इजाजत..
कौन होगा वो घर का नया धणी..
चाहे हो वो गंजा,
चाहे हो वो छैला चाहे हो दूज-बर..
मुझे तो था बस बनना धण...
ना उमंग ना आशा ...
जैसा हो नया घर !
दहेज के ताने,
गरीबी ही जाने ...
किसी को जलना तो किसी को पिटना होता है...
दहेज लोभियों की जिल्लतें सहते ही सहते,
रोते रोते मर जाना होता है..
हाँ मैं तो बेटी हूँ ...
पेट में बच्चा होने का अंदाज
सुहाना होता है....
बेटी हो या बेटा...
माँ को तो माँ रहना है ..
जमाने को चाहिये बेटा,
बेटी हो दफनाना है :(
इसी कशिश में इसी तड़प में एक
माँ को भी तो मर जाना है...
गर्भपात हो या भ्रूण-हत्या ... भ्रूण के
साथ एक माँ भी मरती है !
बेटी होना कितना भी बुरा हो .. पर मैं
तो बेटी हूँ ...
घर में जन्मी हूँ घर में मरूंगी ..
घर बदलेगा ...
माँ और बेटी नहीं बदलेगी !
जन्म से विवाह तक दिन-रात मैंने अपने
बाबुल के घर को सींचा है !
विवाह से मृत्यु तक ससुराल का हर मान
निभाया है !
फिर भी बेटी की हत्या की जाती है !
बेटी होगी तभी तो बहु, माँ, बहन
होगी...
अगर चलता रहा ऐसे ही..
पृकृति खुद लेगी बदला ..
तैयार रहे...
बेटी ने घर को केवल सींचा है, समझा है
चलाया है !
आदमी करै चौधर झूटी, लुगाई चलावै घर !
** एक बेटी का खत दुनिया के नाम !!!

Wednesday, July 25, 2012

betiya


बेटी का जन्म
क्या कहूँ की जो शुरुआत हुई
जैसे तपते दिन में रात हुई
सूरज ने ली सब किरणें समेट
मातम ने घर को लिया चपेट
सबकी शक्लें मुरझाई हैं
हाय ! लड़की घर में आई है
न थाली बजी, न पेड़े बटें
न मिली दुआ , न उतरी बला
छाई आफत की परछाई हैं
पर माँ तो "माँ "है क्या करती
कैसे देख उसे, आहें भरती
ये रिश्ता जग से न्यारा है
उसे तो बेटी का रूप भी प्यारा है
पिता का दिल कुछ भारी है
पर संतान इन्हें भी प्यारी है
चिंता हो मन में, फिर भी मैं
होंठो को अपने सी लूँगा
चार निवाले दे तुझको
खुद दो घूंट पानी पी लूँगा
बस दिल में गहरा दर्द भरा
ना सोना बड़ा घड़ो में कभी
न रकम बड़ी है तिजोरी में
बरस में दो दो सावन आकर
रंग भरे हैं मेरी छोरी में
बीत गए, दिनों में साल कई
एक दम से मुनिया, बड़ी हुई
कुछ भी कर अब पिता को तो
बेटी का ब्याह रचाना है
दहेज़ की मांग पूरी करने को
खुद खड़े खड़े बिक जाना है
इतने पर भी उनको चैन कहा
जो दहेज़ नहीं कभी लेते है
बस बेटी को अपनी, उपहार दीजिये
इतना ही कह देते है
आव भगत की बात तो तय है
कपड़े कितने दिलाओगे
ठाकुरजी के भोग को क्या ना
चाँदी के बर्तन लाओगे
मारुती में ही गुजर करेंगे
छोटे से फ्लेट में रह लेंगे
बेटी को दो, जो देना है
हम दहेज़ कतई नहीं लेंगे
तब रोती है ममता खुद पर
और बाप का दिल भर आता है
वरना बेटी का मखमल सा
प्यार किसे नहीं भाता है
जब तक दहेज़ के दानव का
विस्तार यहाँ ना कम होगा
तब तक गरीब के घरो में
"बेटी का जन्म" मातम होगा

Sunday, July 22, 2012


नेह, ममता, करुणा की, हैं मूर्त साकार बेटियां
देती है माँ – बहिन, पत्नी का प्यार बेटियां
रखती ख्याल सबका हैं, ये होशियार बेटियां
हैं बड़ी हिम्मती यह, नहीं मानती हैं हार बेटियां

काली, दुर्गा, सरस्वती, हैं देवियाँ हज़ार बेटियां,
आने वाली पीढ़ी को, देती है संस्कार बेटियाँ,
बेटे से कहाँ हैं कम, ये ये समझदार बेटियां,
कल्पना की उड़ान में, जा चुकी अंतरिक्ष पार बेटियां |

फिर बताओ न पापा सच-सच, क्यों नहीं करते प्यार बेटियाँ
क्यों पैदा होने से पहले ही, देते हो मार बेटियां ?
अभी धडकनें बनी थी बस, सांसें ना मिल पाई उधार बेटियां,
आँखें तक ना खुल पायीं, न देख पाई संसार बेटियां |

बेटियों ने जिन्हें जनम दिया, उन्हें ही नहीं स्वीकार बेटियां,
कौन सा यह न्याय है, क्यों जुल्म की शिकार बेटियां,
कैसे कहे किससे कहे, ये अजन्मी मूक – लाचार बेटियां ?
बस लड़ रही खुदा से वह, क्यों बनाया तूने परवरदिगार बेटियां ?

Monday, June 25, 2012

राह देखता तेरी बेटी, जल्दी से तू आना,
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना,

ना चाहूं मैं धन और वैभव, बस चाहूं मैं तुझको
तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा, मिल जाएगी मुझको,

सारी दुनिया है एक गुलशन, तू इसको महकाना
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना,

बन कर रहना तू गुड़िया सी, थोड़ा सा इठलाना,
ठुमक-ठुमक कर चलना घर में, पैंजनिया खनकाना

चेहरा देख के तू शीशे में, कभी-कभी शरमाना
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना

उंगली पकड कर चलना मेरी, कांधे पर चढ़ जाना
आंचल में छुप जाना मां के, उसका दिल बहलाना

जनम-जनम से रही ये इच्छा, बेटी तुझको पाना
किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना।
एक नन्ही सी कली, धरती पर खिली
लोग कहने लगे पराई है पराई
जब तक कली ये डाली से लिपटी रही
आँचल मे मुँह छिपा कर, दूध पीती रही
फूल बनी धागे मे पिरोई गई
किसी के गले में हार बनते ही
टूट कर बिखर गई
ताने सुनाये गये दहेज में क्या लाई है
पैरों से रौन्दी गई
सोफा मार कर घर से निकाली गई
कानून और समाज से माँगती रही न्याय
अनसुनी कर उसकी बातें
धज्जियाँ उड़ाई गई
अंत में कर ली उसने आत्महत्या
दुनिया से मुँह मोड़ लिया
वह थी
एक गरीब माँ बाप की बेटी.

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता ।

माँ भी होती बाप भी होता,
न भाभी होती न भैया होता,
गर मैं भी अकेला होता,
बहन होती न जीजा होता।

दादी होती दादा भी होता,
न चाची होती न चाचा होता,
गर मेरा बाप अकेला होता,
फुफी होती न फुफा होता।

नानी होती नाना भी होता,
न मामी होती न मामा होता,
गर मेरी माँ अकेली होती,
मौसी होती न मौसा होता।

सास भी होती ससुर भी होता,
न साली होती न साला होता,
गर मेरी बीबी अकेली होती,
मैं भी किसी का जीजा न होता।

अगर एक बेटी या बेटा होता,
दुनीयाँ में ये नाता न होता !!
 

बोलो न माँ …………..बेटिया क्यों बोझ होती है .?
''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''
क़त्ल करना है तो सबका करो
मुझ अकेली को मारने से क्या होगा
अगर मिटाना है मेरी हस्ती को
तो सबको मिटाओ …………..
मुझ अकेली को मिटाने से क्या होगा …………..

हूँ गुनहगार अगर मैं दादी
तो दोषी तो आप भी है
सजा देनी है तो खुद को भी दो
मुझ अकेली को देने से क्या होगा …………………

किया होता अगर ऐसा ही
दादी के पापा ने दादी के साथ
तो क्या आज आप होते पापा
जरा सोच कर तो देखिये …………………
मेरे इस नन्हे से जिस्म के टुकडो को
जो रंगे हुए है खून से ……………..
एक छोटी सी सुई चुभ जाती है जब उँगली में
तो कितना दर्द होता है ……..
जानते है न पापा आप ……………………..
फिर कैसे …………….फिर कैसे पापा
कैसे आपने कर दिया अपने ही अंश को
उन सब के हवाले काटने के लिए ……………
एक नन्ही सी जान को मरने के लिए
अगर बोझ ही उतरना है …………….
तो दादी को, माँ को, बुआ को भी मारो
मुझ अकेली को मारने से क्या होगा
क़त्ल करना है………………………………..
कितनी आसानी से मान गई आप भी माँ
क्यों —- क्या मैं कोई भी नही थी आपकी
या मज़बूरी थी आपकी भी ……….
भगवान की तरह………………
भगवान जिन्हें मालूम है अपने इंसानों की फितरत
जो जानते है —– इन लालची इंसानों की हैवानियत को
लेकिन फिर भी भेज देते है हमे इस दुनिया में
जिन्दा क़त्ल होने के लिए …………..
बिन जन्मे ही मार दिए जाने के लिए

क्या आप भी ऐसे ही मजबूर थी माँ
या आप भी डर गयी थी दादी और पापा की तरह
कि कही मैं आप पर बोझ न बन जाऊँ
अपने बेटे का पेट तो भर सकते है आप
लेकिन क्या मुझे दो वक़्त की रोटी नही दे पाते
क्या मैं इतना खा लेती माँ …………………….
कि आप लोगो के लिए मुझे पालना मुश्किल हो जाता
क्या मैं सच में बोझ बन जाती माँ
आपके लिए भी ………………
क्या इसीलिए आप सबने मुझे जन्म लेने से पहले ही मार दिया
क्या सच में ही बेटियाँ बोझ होती है माँ
बोलो न माँ ……….क्यों बेटियाँ बोझ होती है !

Thursday, March 29, 2012

बेटियां,

बेटी है तो कल है"
बेटी है तो कल है .
बेटी गंगा जैसी पावन.बेटी गंगा जल है .
बेटी सुख की नदिया. बेटी निश्चल अविरल है ..बेटी है तो कल है .
बेटी से होता रोशन सरे जग का आँगन है,
बेटी आँगन की तुलसी,बेटी नयनजल है ..
बेटी है तो कल है .
बेटी बिन न होता कोई कम सफल है ...बेटी है तो कल है..
बेटी से है होली. बेटी से है दिवाली .
बेटी से रक्षाबंधन जैसा पर्व है ...बेटी है तो कल ...
बेटी चांदनी है बेटी रोशनी है .
बेटी न रुकने वाली ऐसी एक लहर है ..बेटी है तो कल है .
देती साथ अपनों का .उठाती बोझ अपनों का हश हश कर ..करती ये रोशन अपने बाबुल का घर है .
बेटी है तो कल है ..
बेटी को कोख में मत मरो उसे भी जीने का हक़ है..


बेटियां,

तो बहु कहाँ से लाओगे??????

नन्ही सी एक कली हूँ मैं
कल मैं भी तो इक फूल बनूँगी
महका दूंगी दो घर आँगन
खिलकर जब मैं यूँ निखरुंगी

ना कुचलो अपने कदमों से
यूँ मुझको इक फल की चाहत में
फल कहाँ कभी बागबां का हुआ है
गिरता अक्सर गैरों की छत पे

उम्र की ढलती शाम में जब
ना होगा साथ कोई साया
याद आयेगा ये अंश तुम्हारा
जिसको तुमने खुद ही है बुझाया

क्या इन फलों से ही है माली
तेरी इस बगिया की पहचान
गुल भी तो बढ़ाते है खिलकर
तेरी इस गुलिस्तां की शान

बोलो फूल ही ना होंगे तो
तुम फल कहाँ से पाओगे
बेटी जो ना होगी किसी की
तो बहु कहाँ से लाओगे?

तो बहु कहाँ से लाओगे??????



बेटियां

ऐसी होती हैं बेटियां

मिट्टी की खुशबू-सी होती हैं बेटियां,
घर की राज़दार होती हैं बेटियां,

बचपन हैं बेटियां, जवानी हैं बेटियां,
सत्यम्-शिवम् सुंदरम्-सी होती हैं बेटियां,

सूरज-सी खिलखिलाती होती हैं बेटियां,
चंदा की मुस्कुराहट-सी होती हैं बेटियां,

दुर्गा-सी बेटियां, कभी गंगा-सी बेटियां,
हर महिषासुर का वध करने को तैयार बेटियां,

मायके से ससुराल का सफर तय करती हैं बेटियां,
कल्पना में बेटियां, कभी वास्तविकता में बेटियां,

फिर क्यों जला देते हैं ससुराल में बेटियां?
फिर क्यों ना बांटे खुशियां जब होती हैं बेटियां?

एक नहीं दो वंश चलाती हैं बेटियां,
फिर गर्भ में क्यों मार दी जाती हैं बेटियां?


बेटियाँ "

बेटियाँ

प्यार का मीठा एहसास हैं बेटियाँ
घर के ऑंगन का विश्वास हैं बेटियाँ

वक़्त भी थामकर जिनका ऑंचल चले
ढलते जीवन की हर श्वास हैं बेटियाँ

जिनकी झोली है खाली वही जानते
पतझरों में भी मधुमास हैं बेटियाँ

रेत-सी ज़िन्दगी में दिलों को छुए
मखमली नर्म-सी घास हैं बेटियाँ

तुम न समझो इन्हें दर्द का फलसफा
कृष्ण-राधा का महारास हैं बेटियाँ

उनकी पलकों के ऑंचल में ख़ुशियाँ बहुत
जिनके दिल के बहुत पास हैं बेटियाँ

गोद खेली, वो नाज़ों पली, फिर चली
राम-सीता का वनवास हैं बेटियाँ

जब विदा हो गई, हर नज़र कह गई
ज़िन्दगी भर की इक प्यास हैं बेटियाँ


बेटियाँ "

बेटियाँ "

सुबह की सुनहली धूप _सी ये मासूम बेटियाँ,

जब घर में जन्म लेती है,

कहीं ख़ुशी तो कहीं मातम होता है,

कहीं तो कोमल कली_सी पाली जाती हैं,

ओर कहीं काली रात _सी धुत्कार दी जाती है,

थोड़ा सा प्यार पा कर खिल जाती हैं,

जहाँ भी जाएँ दूध में पानी_ सी मिल जाती हैं,

सुबह की सुनहली धूप_ सी मासूम

ये बेटियाँ

स्रिस्टी को जन्म देती हैं,

अपने गर्भ में पालती हैं,

ओर गर्भ में ही मार दी जाती हैं,

ये बेटियाँ

जग स्तंभ कहलाती हैं

फिर भी सहारे को तरसती हैं,

सुबह की सुनहरी धूप सी मासूमयाँ

ये बेटियाँ "

बेटियाँ "

बेटी

ह्रदय का अंग होती

उसकी पीड़ा सही

ना जाती

व्यथा उसकी

निरंतर रुलाती

ह्रदय को तडपाती

एक पल भी चैन नहीं

लेने देती

मन सदा

उसकी कुशल क्षेम चाहता

उसके प्यार में डूबा

रहता

बेटी का जन्म

पिता का सबसे

महत्वपूर्ण सृजन होता

प्रेम निश्छल,निस्वार्थ होता

उसकी खुशी ह्रदय की

सबसे बड़ी खुशी होती

बेटी ,पिता के जीवन में

खिलती धूप सी होती

उसकी कमी

अन्धकार से कम

ना होती

बेटी पिता को

परमात्मा की भेंट होती

उसके नाम से ही आँखें

नम होती


बेटियाँ "

बेटी है तो कल है"

बेटी है तो कल है .

बेटी गंगा जैसी पावन.बेटी गंगा जल है .

बेटी सुख की नदिया. बेटी निश्चल अविरल है ..बेटी है तो कल है .

बेटी से होता रोशन सरे जग का आँगन है,

बेटी आँगन की तुलसी,बेटी नयनजल है ..

बेटी है तो कल है .

बिन न होता कोई कम सफल है ...बेटी है तो कल है..

बेटी से है होली. बेटी से है दिवाली .

बेटी से रक्षाबंधन जैसा पर्व है ...बेटी है तो कल ...

बेटी चांदनी है बेटी रोशनी है .

बेटी न रुकने वाली ऐसी एक लहर है ..बेटी है तो कल है .

देती साथ अपनों का .उठाती बोझ अपनों का हश हश कर ..करती ये रोशन अपने बाबुल का घर है .

बेटी है तो कल है ..

बेटी को कोख में मत मरो उसे भी जीने का हक़ है.
.

बेटियाँ "

बेटी .......प्यारी सी धुन

न जाने क्यों आज भी

हमारे समाज में

हर घर परिवार में

पुत्र की चाहत का

इज़हार किया जाता है।

गर बेटी हो जाए

तो माँ का तिरस्कार किया जाता है।

कितनी मजबूर होती होगी

वो माँ

जो अपने गर्भ में

पलने वाले बच्चे को

मात्र इस लिए काल के

क्रूर हाथों के हवाले कर दे

कि वो बेटी है।

नष्ट कर देते हैं

बेटी कि संरचना को

भूल जाते हैं सच्चाई कि

यही बेटियाँ सृष्टि रचती हैं।

शायद ऐसे लोग बेटी की

अहमियत नही जानते हैं

बेटा लाख लायक हो

पर बेटियाँ

मन में बसती हैं

उनके रहने से

न जाने कितनी

कल्पनाएँ रचती हैं।

बेटियाँ माँ का

ह्रदय होती हैं , सुकून होती हैं

उसके जीवन के गीतों की

प्यारी सी धुन होती हैं.

बेटियाँ

बेटियाँ


प्यार का मीठा एहसास हैं बेटियाँ

घर के ऑंगन का विश्वास हैं बेटियाँ

वक़्त भी थामकर जिनका ऑंचल चले

ढलते जीवन की हर श्वास हैं बेटियाँ

जिनकी झोली है खाली वही जानते

पतझरों में भी मधुमास हैं बेटियाँ

रेत-सी ज़िन्दगी में दिलों को छुए

मखमली नर्म-सी घास हैं बेटियाँ

तुम न समझो इन्हें दर्द का फलसफा

कृष्ण- -राधा का महारास हैं बेटियाँ

उनकी पलकों के ऑंचल में ख़ुशियाँ बहुत

जिनके दिल के बहुत पास हैं बेटियाँ

गोद खेली, वो नाज़ों पली, फिर चली

राम-सीता का वनवास हैं बेटियाँ

जब विदा हो गई, हर नज़र कह गई

ज़िन्दगी भर की इक प्यास हैं बेटियाँ

बेटियाँ "

बेटियाँ "


सुबह की सुनहली धूप _सी ये मासूम बेटियाँ,

जब घर में जन्म लेती है,

कहीं ख़ुशी तो कहीं मातम होता है,

कहीं तो कोमल कली_सी पाली जाती हैं,

ओर कहीं काली रात _सी धुत्कार दी जाती है,

थोड़ा सा प्यार पा कर खिल जाती हैं,

जहाँ भी जाएँ दूध में पानी_ सी मिल जाती हैं,

सुबह की सुनहली धूप_ सी मासूम

ये बेटियाँ

स्रिस्टी को जन्म देती हैं,

अपने गर्भ में पालती हैं,

ओर गर्भ में ही मार दी जाती हैं,

ये बेटियाँ

जग स्तंभ कहलाती हैं

फिर भी सहारे को तरसती हैं,

सुबह की सुनहरी धूप सी मासूम

ये बेटियाँ